दीप से अधिक उजाला, रक्तदान से जीवन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर जनप्रतिनिधियों से सेवा-संकल्प का आह्वान
डॉ. नवीन आनंद जोशी
भारत की सार्वजनिक जीवन-परंपरा में सेवा का भाव कोई नया विचार नहीं है। हमारी संस्कृति ने सदियों से मनुष्य को मनुष्य के काम आने की प्रेरणा दी है। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी की पीड़ा में उसके साथ खड़ा होना और आवश्यकता के समय किसी
अनजान व्यक्ति के जीवन की डोर थाम लेना—यही तो सेवा का वास्तविक अर्थ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक जीवन में स्वयं को ‘प्रधान सेवक’ कहकर राजनीति के उस मूल भाव को सामने रखा है, जिसमें पद से अधिक दायित्व और अधिकार से अधिक कर्तव्य का महत्व है। देश को आत्मनिर्भर, सशक्त और विश्व में अग्रणी बनाने के उनके संकल्प के साथ सेवा और जनभागीदारी की भावना को भी निरंतर प्रोत्साहित किया जाता रहा है।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस 17 सितंबर को सेवा की एक ऐसी परंपरा से जोड़ने का विचार सामने आना चाहिए, जिसका सीधा संबंध किसी व्यक्ति की जान बचाने से हो। 17 सितंबर का दिन विश्वकर्मा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। विश्वकर्मा सृजन, निर्माण और कर्म के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसे दिन यदि हम सेवा का कोई ऐसा संकल्प लें, जो किसी जरूरतमंद के जीवन में वास्तविक प्रकाश पैदा करे, तो इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है?
एक जनप्रतिनिधि—एक रक्तदान…
क्यों न देशभर के जनप्रतिनिधि इस अवसर पर एक अनूठा ‘सेवा संकल्प’ लें?नगर पार्षद, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर परिषद अध्यक्ष, महापौर, जिला पंचायत प्रतिनिधि, विधायक, सांसद और मंत्री—जो जनता के बीच से चुनकर सार्वजनिक जीवन में आए हैं—वे अपने जन्मदिवस अथवा वर्ष में किसी एक विशेष अवसर पर स्वेच्छा से रक्तदान का संकल्प लें।
कल्पना कीजिए, यदि देश के हजारों जनप्रतिनिधि एक साथ रक्तदान करें तो कितने यूनिट रक्त ब्लड बैंकों तक पहुँच सकता है। यह रक्त किसी अनजान दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के काम आ सकता है, किसी प्रसूता की जिंदगी बचा सकता है, किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के परिवार को राहत दे सकता है अथवा किसी ऐसे गरीब परिवार के लिए जीवनदान बन सकता है जिसके पास इलाज के खर्च के साथ रक्त की व्यवस्था करने का भी संकट हो।
रक्त का कोई धर्म नहीं होता, कोई जाति नहीं होती, कोई राजनीतिक दल नहीं होता। रक्त केवल रक्त होता है—और जब वह किसी दूसरे मनुष्य की नसों में जीवन बनकर दौड़ता है, तब सेवा की सबसे सुंदर परिभाषा सामने आती है।
श्रद्धा का सबसे बड़ा दीप
हमारे देश में उत्सवों और विशेष अवसरों पर दीप प्रज्ज्वलित करने की समृद्ध परंपरा है। दीप अंधकार को दूर करता है, इसलिए वह हमारी आस्था और आशा का प्रतीक है। लेकिन आज हमें यह भी विचार करना चाहिए कि कौन-सा दीप सबसे अधिक उजाला करता है?
एक दिन के लिए हजारों-लाखों दीप जलाने से वातावरण में उत्सव का प्रकाश अवश्य फैलता है, लेकिन यदि उसी भावना को किसी जरूरतमंद के जीवन तक पहुँचाया जाए तो उसका प्रकाश कहीं अधिक स्थायी हो सकता है।
एक दीप कुछ घंटों तक जलता है,लेकिन एक यूनिट रक्त किसी मनुष्य के जीवन में कई वर्षों की संभावनाएँ लौटा सकता है।इसलिए इस बार दीप जलाने के साथ-साथ जीवन बचाने का संकल्प भी क्यों न लिया जाए? यह किसी परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि सेवा की परंपरा का विस्तार है। दीप भी जलें, उत्सव भी हो, आस्था भी प्रकट हो—लेकिन उसके साथ रक्तदान जैसी जीवनदायी सेवा भी जुड़े।
‘प्रधान सेवक’ की भावना को जनसेवा में बदलने का अवसर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सार्वजनिक जीवन में सेवा को विशेष महत्व देते हैं और अपने जन्मदिवस से जुड़े आयोजनों में सेवा गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता रहा है। ऐसे में उनके समर्थकों और शुभचिंतकों के सामने यह एक रचनात्मक अवसर है कि वे जन्मदिन को केवल शुभकामनाओं, पोस्टरों, माल्यार्पण और समारोहों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे सेवा-संकल्प का पर्व बनाएं।यदि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री को अपना आदर्श मानता है, तो उसके आदर्श के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल शब्दों से नहीं, कर्म से भी व्यक्त होनी चाहिए।और कर्म भी ऐसा, जिसका लाभ सीधे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
किसी अस्पताल में भर्ती गरीब मरीज के परिजन जब रक्त के लिए भटक रहे हों और उसी समय किसी जनप्रतिनिधि द्वारा दिया गया रक्त उसके काम आ जाए—तो इससे बड़ी जनसेवा क्या होगी?किसी सड़क दुर्घटना में घायल युवक को समय पर रक्त मिल जाए और उसका जीवन बच जाए—तो उससे बड़ा सेवा संदेश क्या होगा?किसी माँ की जान प्रसव के दौरान रक्त उपलब्ध होने से बच जाए—तो इससे बड़ा उत्सव कौन-सा हो सकता है?
राजनीति से ऊपर उठकर सेवा…
रक्तदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें दाता और प्राप्तकर्ता का परिचय आवश्यक नहीं होता। न यह पूछा जाता है कि सामने वाला किस दल को मानता है, किस जाति से है, किस धर्म का है या किस विचारधारा से जुड़ा है।रक्तदान मनुष्य को केवल मनुष्य मानता है।यही लोकतंत्र की मूल आत्मा भी है—जनता के लिए, जनता के बीच और जनता के हित में काम करना।इसलिए देश के सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों से यह आग्रह होना चाहिए कि वे अपने जन्मदिवस, विवाह वर्षगांठ या किसी अन्य व्यक्तिगत उत्सव को केवल निजी समारोह न बनाकर ‘सेवा दिवस’ में परिवर्तित करने की पहल करें।
हर वर्ष एक दिन।
एक रक्तदान।
एक सेवा-संकल्प।और संभव है कि इसी एक छोटी-सी शुरुआत से देश में एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो जाए।
रक्तदान—किसी अजनबी के लिए जीवन का उपहार
हम अक्सर कहते हैं कि देश को बदलने के लिए बड़े काम करने पड़ेंगे। लेकिन समाज में परिवर्तन कई बार छोटे-छोटे संकल्पों से शुरू होता है।एक व्यक्ति रक्तदान करता है। दूसरा उसे देखकर प्रेरित होता है।फिर परिवार रक्तदान करता है।फिर संस्था।फिर जनप्रतिनिधि।और देखते ही देखते यह एक सामाजिक संस्कार बन सकता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर यदि देशभर में यह संदेश जाए कि ‘मैंने अपने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर किसी के जीवन के लिए रक्तदान किया है’, तो यह किसी भी औपचारिक शुभकामना से कहीं अधिक अर्थपूर्ण संदेश होगा।आइए, इस बार संकल्प कुछ ऐसा हो ।
17 सितंबर को दीप जलाइए, शुभकामनाएँ दीजिए, उत्सव मनाइए—लेकिन साथ ही किसी रक्त बैंक में जाकर स्वैच्छिक रक्तदान भी कीजिए।जनप्रतिनिधि आगे आएँ।सामाजिक संस्थाएँ आगे आएँ।पत्रकार संगठन आगे आएँ।युवा आगे आएँ,व्यापारी, कर्मचारी, विद्यार्थी और आम नागरिक आगे आएँ।क्योंकि देश केवल संसद और विधानसभाओं से नहीं बनता; देश उन करोड़ों हाथों से बनता है जो संकट की घड़ी में एक-दूसरे का हाथ थामते हैं।यदि ‘प्रधान सेवक’ की भावना को वास्तव में जन-जन तक पहुँचाना है, तो सेवा का यह संकल्प एक सार्थक शुरुआत हो सकता है।इस बार श्रद्धा में केवल दीप न जलाएँ—किसी की नसों में जीवन का दीप जलाएँ।प्रधानमंत्री के जन्मदिवस पर शुभकामना का सबसे सुंदर उपहार शायद यही हो सकता है—एक जनप्रतिनिधि, एक रक्तदान, एक जीवन की उम्मीद।यही जनसेवा है।और शायद यही किसी आदर्श के प्रति सच्ची श्रद्धा का सबसे मानवीय रूप भी है।



