देशमध्य प्रदेश

राम मंदिर की गिलहरी और जटायु: कृतज्ञता का शाश्वत संदेश

(अयोध्या के दो अद्वितीय प्रतीक, जो मानवता को विनम्रता और आभार का असली अर्थ सिखाते हैं)

डॉ. नवीन आनन्द जोशी
अयोध्या—जिसे धर्म, संस्कृति और मानवता का अनन्त केंद्र माना जाता है—आज अपने प्रांगण में दो ऐसी प्रतिमाओं को संजोए हुए है, जो समूची मानव सभ्यता को कृतज्ञता और विनम्रता का कालातीत संदेश देती हैं। एक ओर गिद्धराज जटायु की महाकाय प्रतिमा है, जो धर्मरक्षा के लिए किए गए उनके वीरतापूर्ण बलिदान का स्मारक है; और दूसरी ओर रामसेतु की नन्ही गिलहरी, जिसकी छोटी-सी सेवा को भगवान राम ने उतना ही सम्मान दिया, जितना किसी महायोद्धा के पराक्रम को दिया जाता है।

इन दोनों प्रतिमाओं की उपस्थिति केवल दैवी कथा का स्मरण नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म मूल्यों की पुनर्स्थापना है, जो मनुष्य के हृदय को अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय और अधिक उदात्त बनाते हैं।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित गिलहरी की कथा मानव हृदय की सबसे कोमल परत को स्पर्श करती है। समुद्र पर सेतु निर्माण का विराट कार्य चल रहा था—वानर सेना पर्वतों और विशाल शिलाखंडों को उठा कर समुद्र में डाल रही थी। उसी समय एक छोटी-सी गिलहरी अपनी नन्ही देह से जितना संभव हो सके, उतने छोटे-छोटे कंकड़ लाकर समुद्र में डालती जा रही थी।

वानरों ने उसके इस प्रयास को तुच्छ समझकर उपहास किया। परंतु भगवान राम ने जब यह दृश्य देखा, तो उन्होंने शक्ति की नहीं—भक्ति और निष्ठा की महत्ता समझी।
उन्होंने प्रेमपूर्वक गिलहरी को अपनी हथेलियों में उठाया, और उसके तप, समर्पण और श्रम को देखकर उसकी पीठ पर तीन दिव्य रेखाएँ अंकित कर दीं। यही तीन धारियाँ आज भी भारतीय गिलहरियों की पहचान हैं—प्रभु के स्पर्श का पावन अंश।
अयोध्या में स्थापित गिलहरी की भव्य प्रतिमा इस पवित्र शिक्षा को अमर करती है कि हर सेवा—चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो—योगदान की श्रेणी में आती है और सम्मान की अधिकारी होती है।

यदि गिलहरी भक्ति और विनम्रता की प्रतीक है, तो जटायु धर्मनिष्ठ साहस और आत्मबलिदान का सर्वोच्च रूप हैं।जब रावण सीता का हरण कर ले जा रहा था, तब वृद्धावस्था से झुके पंखों वाले जटायु ने अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया।शक्ति में असमानता थी, पर अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प पर्वत जैसा अटल। वह रावण से लड़ते रहे, सीता की रक्षा का हर संभव प्रयास करते रहे। अंततः घायल होकर पृथ्वी पर गिरे, परंतु धर्म का उल्लंघन चुपचाप नहीं होने दिया।

जब प्रभु राम वहां पहुँचे, तो उनकी व्यथा और करुणा उस क्षण चरम पर थी। उन्होंने जटायु को पिता समान सम्मान दिया, गोद में सिर रखकर अंतिम क्षणों में उन्हें आश्वस्त किया और स्वयं उनके अंतिम संस्कार का दायित्व निभाया।

जटायु को राम ने केवल मोक्ष ही नहीं दिया—उन्होंने उन्हें वह स्थान दिया जिसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। अयोध्या में स्थापित जटायु की विराट प्रतिमा हमें प्रतिदिन यह स्मरण कराती है कि धर्म की रक्षा करने वाला कोई भी प्रयास छोटा नहीं होता—और त्याग का सम्मान सदैव सर्वोपरि होता है।

गिलहरी और जटायु—ये दोनों पात्र स्वभाव, शक्ति और स्वरूप में एक-दूसरे से भिन्न हैं।
एक नन्हा जीव है जो कंकड़ उठाता है, दूसरा महाबली पक्षीराज है जो रावण से युद्ध करता है। परंतु राम के लिए दोनों महान थे—क्योंकि दोनों ने अपनी क्षमता भर धर्म की सहायता की।

अयोध्या में इन दोनों प्रतिमाओं का साथ में स्थापित होना हमें यह गहन शिक्षा देता है कि समाज केवल महान पराक्रमों से नहीं, बल्कि अनगिनत छोटे योगदानों की नींव पर खड़ा होता है।किसी का दिया प्रेरणादायक शब्द,किसी की दी छोटी-सी मदद,किसी का कठिन समय में दिया साथ—ये सब वही “कंकड़” हैं जो जीवन रूपी सेतु को पूरा करते हैं।

आज की दुनिया में जब मनुष्य केवल बड़े कार्यों, बड़े नामों और बड़े उपलब्धियों को महत्व देता है, तब राम मंदिर परिसर के ये दोनों प्रतीक हमें हमारी मूल मानवीय संवेदना की ओर लौटाते हैं।वे बताते हैं कि कृतज्ञता केवल एक भाव नहीं,यह हृदय का अनुशासन है—जो मनुष्य को विनम्र बनाता है,संबंधों में सच्चा बनाता है,और समाज में प्रेम, सहयोग तथा सौहार्द का बीज बोता है।

राम मंदिर के आँगन में साथ खड़े जटायु और गिलहरी के ये दोनों अमर प्रतीक प्रतिदिन हमें संबोधित करते हैं— कि जीवन वास्तव में तब महान बनता है,जब हम हर हाथ को, हर प्रयास को, हर सहयोग को सम्मान देना सीखते हैं। गिलहरी की नन्ही सेवा हो या जटायु का विराट बलिदान—दोनों की गरिमा समान है। यही संतुलन रामराज्य की आत्मा था,और यही संतुलन आज भी समाज को अधिक संवेदनशील, अधिक सहयोगी और अधिक उज्ज्वल बना सकता है।

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